मानेसर में पहली बार फोर्टिस में जटिल ऑर्थोपेडिक रोगों के उपचार के लिए पेश की मांको रोबोट एडेड सर्जरी की सुविधा

NCR Digital Channel: Ravinder Bhàti

मानेसर में पहली बार –
फोर्टिस मानेसर ने जटिल ऑर्थोपिडिक रोगों के उपचार के लिए क्षेत्र में पेश की माको रोबो-एडेड सर्जरी की सुविधा,
लंबे समय से घुटनों के दर्द और अन्य तकलीफों से जूझ रहे मरीजों का किया सफल इलाज

मानेसर, 25 फरवरी, 2026: बहुत से मरीजों के लिए, घुटनों का पुराना दर्द (क्रोनिक) केवल शारीरिक तकलीफ ही नहीं होता – बल्कि वह धीरे-धीरे उनकी मोबिलिटी, आजादी और अंततः जीवन की गुणवत्ता भी छीन लेता है। यदि ऐसे में रोगों का निदान करने में देरी हो या सर्जरी को लेकर टाल-मटोल की जाए तो मरीज को कई वर्षों तक चलने-फिरने में असुविधा और सीमित मोबिलिटी जैसी समस्याओं को सहन करना पड़ता है। वे कई बार अपनी रोजमर्रा की गतिविधियों जैसे चलने-फिरने या सीढ़ियां चढ़ने से भी मजबूर हो जाते हैं। ऐसे मरीजों के लिए, फोर्टिस हॉस्पीटल मानेसर ने उम्मीद की एक नई किरण दिखायी है और क्षेत्र में पहली बार वर्ल्ड-क्लास माको (MAKO) रोबोटिक-आर्म असिस्टेड नी रिप्लेसमेंट सर्जरी की सुविधा उपलब्ध करायी है। सर्जरी की इस उन्नत तकनीक से बेहद सटीक और पर्सनलाइज़्ड सॉल्यूशन मिलते हैं और लंबे समय से जोड़ों के दर्द तथा अन्य तकलीफों को सहन कर रहे मरीजों को अपनी खोयी मोबिलिटी दोबारा वापस पाने के साथ-साथ अपनी दैनिक गतिविधियों को बिना किसी सहारे के खुद करने की आजादी भी मिलती है।
उन्नत माको टेक्नोलॉजी में एडंवास 3डी सीटी-आधारित प्री-सर्जिकल प्लानिंग की व्यवस्था है जो रोबोटिक-आर्म असिस्टेंस से मिलती है, और इससे सर्जन प्रत्येक मरीज की एनटॅमी के आधार पर हर प्रक्रिया को कस्टमाइज़ कर सकते हैं। इसका एक बड़ा लाभ यह भी मिलता है कि इंप्लांट को सही ढंग से लगाया जा सकता है, हेल्थी बोन और सॉफ्ट टिश्यूज़ को भी सुरक्षित बचाया जाता है तथा सर्जरी के बाद मरीज को तकलीफ कम होती है। यह तकनीक पारंपरिक नी रिप्लेसमेंट तकनीकों की तुलना में मरीज की तेजी से रिकवरी में भी मददगार साबित होती है।
फोर्टिस मानेसर माको सिस्टम की मदद से ऐसे कई मरीजों का सफल उपचार कर चुका है जो घुटनों की कई प्रकार की जटिल समस्याओं से ग्रस्त थे।
पहला मामला 68-वर्षीय आशा देशवाल का है, जो दोनों घुटनों में एडवांस ऑस्टियोआर्थराइटिस की समस्या से पीड़ित थीं और उनकी बाइलेटरल रोबोटिक टोटल नी रिप्लेसमेंट सर्जरी की गई। वह अब आसानी से खड़ी हो सकती हैं, बिना किसी सहारे के चलने-फिरने लगी हैं, और सर्जरी के मात्र छह घंटे बाद ही वह ऐसा करने में समर्थ बन चुकी थीं। आज वह आराम से चलती हैं, पूरे विश्वास के साथ सीढ़ियां चढ़ती हैं और अपने घरेलू कामकाज अपने आप करने लगी हैं – इस तरह दर्द और तकलीफ से दूर एक बार फिर उन्होंने अपनी जिंदगी को वापस पा लिया है।
ऐसा ही एक अन्य मामला, 69-वर्षीय नीलम भयाना का है, जो पिछले करीब 15 वर्षों से घुटनों के दर्द से पीड़ित थी और धीरे-धीरे अपनी आत्मनिर्भरता खो चुकी थीं। बाइलेटरल रोबोटिक नी रिप्लेसमेंट के बाद, वह अब बिना किसी तकलीफ के चलने-फिरने में समर्थ हो गई हैं, पारिवारिक समारोहों में सक्रियता से हिस्सा लेने लगी हैं, और एक बार फिर अपने बलबूते अपनी दिनचर्या का आनंद लेने में सक्षम हो चुकी हैं।
इसी तरह, 69-वर्षीय राधिया देवी, जो कि पिछले कई वर्षों से दोनों पैरों में घुटनों के दर्द की गंभीर समस्या झेल रही थी, बाइलेटरल रोबोटिक नी रिप्लेसमेंट सर्जरी के 24-घंटे बाद ही अपने पैरों पर खड़ी होने लगी हैं। अब वह अपने दैनिक जीवन में आत्मनिर्भर हैं और आत्मविश्वास से भर चुकी हैं।
61-वर्षीय संतोष, पिछले करीब तीन वर्षों से घुटनों के दर्द की गंभीर समस्या से पीड़ित थीं और हल्की-फुल्की मूवमेंट भी उनके लिए मुश्किल थी। लेकिन रोबोटिक सर्जरी के बाद, अब वह आसानी से चलने-फिरने लगी हैं, बिना किसी तकलीफ के सीढ़ियां चढ़ती हैं, और मोबिलिटी के साथ ही, उनकी मोबिलिटी भी लौट गई है।
सबसे बड़ा बदलाव 74-वर्षीय प्रेम चंद पाहवा में आया, जो एडवांस ऑस्टियोआर्थराइटिस की वजह से गंभीर बो-लेग डिफॉर्मिटी से पीड़ित थे और सीधे खड़े होकर नहीं चल पाते थे। माको (MAKO) सिस्टम की मदद से रोबोटिक टोटल नी रिप्लेसमेंट के बाद उनका यह विकार दूर हो गया है और वह एक बार फिर सीधे खड़े होकर चलने लायक हो चुके हैं। इतना ही नहीं, उनका दर्द भी कम हुआ है, और मोबिलिटी वापस मिलने से उनका सम्मान और अपने प्रति विश्वास भी बढ़ गया है।
डॉ रोहित लांबा, डायरेक्टर – ऑर्थोपिडिक्स, फोर्टिस हॉस्पीटल मानेसर ने कहा, “भारत में ऑस्टियोपोरोसिस और बोन डिजेनरेशन की वजह से आम जनता की स्वास्थ्य चुनौतियां बढ़ रही हैं। इन रोगों के परिणामस्वरूप हड्डियां कमजोर पड़ती हैं, फ्रैक्चर होने की संभावना बढ़ जाती है और जीवन की गुणवत्ता पर भी असर पड़ता है, और यह अक्सर पश्चिमी देशों की आबादी की तुलना में कम उम्र में होने लगता है। अध्ययनों से इस बात के भी संकेत मिले हैं कि ऑस्टियोपोरोसिस और लो बोन मिरनल डेन्सिटी से भारतीयों की एक बड़ी आबादी, जिनमें मुख्य रूप से महिलाएं होती हैं, शिकार बनती हैं। कई बार पोषण संबंधी कमियों, लाइफस्टाइल में बदलाव से कम उम्र वाले लोगों में भी बोन लॉस की समस्या हो जाती है। ऐसे में, रोबोटिक-असिस्टेड ज्वाइंट रिप्लेसमेंट ने ऑर्थोपिडिक सर्जरी के मामले में उम्मीद की किरण दिखायी है। माको रोबोटिक-आर्म असिस्टेड टेक्नोलॉजी की मदद से, सर्जन मरीजों की एनटॅमी के आधार पर, एडवांस 3डी इमेजिंग का प्रयोग करते हुए, हर प्रक्रिया की अच्छी तरह से प्लानिंग कर सकते हैं और असाधारण सटीकता के साथ उसे अंजाम भी दे पाते हैं।”
अभिजीत सिंह, फैसिलिटी डायरेक्टर, फोर्टिस हॉस्पीटल मानेसर ने कहा, “क्षेत्र में माको रोबोटिक-आर्म असिस्टेड नी रिप्लेसमेंट सर्जरी उपलब्ध कराने वाले पहले अस्पाल के तौर पर, फोर्टिस मानेसर ने यह सुनिश्चित किया है कि बुजुर्ग मरीजों को एडवांस ज्वाइंट केयर/इलाज के लिए दिल्ली या अन्य मेट्रो शहरों तक न जाना पड़ा। वर्ल्ड-क्लास रोबोटिक ऑर्थोपिडिक उपचार अब उनके घरों, परिजनों, परिचित स्थानों पर ही उपलब्ध है जहां उनके लिए महत्वपूर्ण सपोर्ट सिस्टम भी मौजूद होता है।”

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